Wednesday, 7 September 2011

बहादुर शाह जफ़र

यार के सब करीब रहते है 

दूर हमसे नसीब रहते है 
नहीं होता किसी से मेरा इलाज 
यहाँ इतने तबीब रहते है
फौजे -हसरत मेर नाला-ओ-आह 
बस, यहीं दो नकीब रहते है
दश्ते-ग़ुरबत में रहते है जो लोग 
वो हमीसे गरीब रहते है
हम किसी गुल के इश्क में नालाँ
रविशे-अंदलीब रहते है
मेरे और उनके मामले बाहम
क्या कहूँ, क्या अजीब रहते हैं
हों वो तनहा तो कुछ कहूँ मैं 'जफ़र' 
साथ उनके रकीब रहते है 
~बहादुर शाह जफ़.

1 comment:

  1. प्रिय निमिषजी,
    "ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी?",
    ये ग़ज़ल ओबैदुल्लाह अलीम की ही है।
    अहमद फ़राज़ की नही है।

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