Wednesday, 7 September 2011

बहादुर शाह जफ़र


यही एक गम है यही एक अलम है
यही एक अलम है यही एक गम है

मेरी चश्म नम है इसी रंज -ओ -गम में
इसी रंज-ओ-गम में मेरी चश्म नम है

मुझे दमबदम है यही इक तरददूद
यही इक तरदुद मुझे दमबदम है

खफा क्यों सनम है नहीं भेद खुलता
नहीं भेद खुलता खफा क्यों सनम है

खुदा की कसम है ये कहता हूँ सच मैं
ये कहता हूँ सच मैं खुदा की कसम है

सितम ही करम है मुझे उस सनम का
मुझे उस सनम का सितम ही करम है

किया कब रक़म है कोई शिकवा मैंने
कोई शिकवा मैंने किया कब रक़म है

वो करता कलम है मिरे हाथ नाहक
मिरे हाथ नाहक वो करता कलम है

'जफ़र' क्या सितम है हुआ दोस्त दुश्मन
हुआ दोस्त दुश्मन 'जफ़र' क्या सितम है

~ बहादुर शाह जफ़र

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सूफियों में हूँ न रिन्दो में न मय-ख़्वारों में हूँ।
ऐ बुतो बन्दा खुदा का हूँ, गुनहगारों में हूँ।।

मेरी मिल्लत है मोहब्बत मेरा मजहब इश्क है।
ख़्वाह हूँ मैं काफ़िरों में ख़्वाहदींदारों में हूँ।

सफ-ए-आलम पे मानिन्दे नगीं मिसले क़लम।
या सियह रूयों में हूँ या सियह कारों में हूँ।

न चढ़ूँ सर पर किसी के, न, मैं पाँवों पर पड़ूँ,
इस चमन के न गुलों में हूँ न मैं ख़ारों में हूँ।

सूरत ए तस्वीर हूँ मैं मयक़दा में दहर के,
कुछ न मदहोशों में हूँ मैं और न होशियारों में हूँ।

न मेरा मोनिस है कोई और न कोई ग़मगु़सार,
ग़म मेरा ग़मख़्वार है मैं ग़म के ग़मख़्वारों में हूँ।

जो मुझे लेता है फिर वह फेर देता है मुझे,
मैं अजब इक जिन्से नाकारा खरीदारों में हूँ।

खान-ए-सैय्याद में हूँ मैं तायर-ए-दार
पर न आज़ादों में हूँ न मैं गिरफ्तारों में हूँ,

ऐ ज़फ़र मैं क्या बताऊँ तुझसे जो कुछ हूँ सो हूँ,
लेकिन अपने फ़ख्र-ए-दीं के क़फ़स बरदारों में हूँ।
~बहादुर शाह ज़फ़र


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