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Wednesday, 28 December 2011

नया साल आकर चला जाता है
पुराना साल, जाते-जाते
पुनः नए-नए वादे कर जाता है
नये आवरण पहनता है
और
फिर नया साल बन जाता है!
अपने
ही नकाबपोश चहरे में
जाने
कितने सियाह राज़ छुपाकर
जाने से पहले
बारूदी फ़टाखों से
शरारों की दिवाली मनाता है
दिलेरों की छाती को छलनी करवाता है
शहादतों के नारे लगवाता है
उनकी बेवाओं को ता-उम्र रुलाता है
माँ बहनों की आशाओं के दीप
अपने नापाक इरादों से बुझवाता है
और फिर
वही एहसान फ़रामोशी का चलन
कुछ नया करने के लिए
नया
आवरण ओढ़कर
आ जाता है
पर
अब उसका स्वागत कौन करे?
कौन उसके सर पर खुशियों का "ताज" रखे
जिसे खँडहर बनाकर
उसने रक़ीबी हसरतें पूरी कर ली
पर
क्या हासिल हुआ?
हहाकार मचा, भूकंप आया
ज़लज़ला थरथराया
और फिर सब थम गया
सिर्फ
धरती का आंचल लाल हो गया
उन वीर सपूतों के लहू से
जिनकी
याद हर साल
फिर ताज़ा हो जाती है
जब पुराना साल जाता है
और नया साल आता है!!!

~देवी नागरानी
नया साल
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एक और वर्ष बीत रहा
बीत रहे लम्हों संग
हम भी तो बीत रहे
उम्र की जो पूँजी थी
वह भी तो रीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

जश्न हम मनाएं क्या
गीत नया गायें क्या
संचित अभिलाषा की
कथा अब सुनाएँ क्या
हौसलों की बुलंदी का
संगी भयभीत खड़ा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

स्मृति की अट्टालिका मे
पल छिन जो ठहरे हैं
अगणित रंगों मे घुले
रंग बड़े गहरे हैं
उसमें गम-सुम से मेरे
सपने सुनहरे हैं
पाँव मेरे ठिठके पर
समय प्रवाह जीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

पर पास खड़ा नया साल
मुझको समझाता है
मद्धिम सी छेड़ तान
मुझको बहलाता है
प्राणों मे फिर से वही
आस फिर जगाता है
बीता जो लम्हा वह
बीत गया बात गई
आगे का हर पल तो
तेरा बस तेरा है
जाने दे उस पल को
जो बीत रहा बीत रहा

~रंजना सिंह
हम भी कभी तो थे, कलैंडर आपकी दीवार के
बदरंग ब्यौरे भर हुए हम आज हैं तिथिवार के

हंसिये हथौड़े की व्यथा अब क्या सुनायें तुमको भला
इनके मसीहा खुद मुसाहिब बन गये बाजार के

है वक्त की कोई शरारत या गई फ़िर उम्र ढ़ल
आते नहीं पहले सरीखे अब मजे त्यौहार के

गिरमिटिये बनकर तब गये थे सात सागर पार हम
पर हैं बने हम बंधुआ अब अपनी ही सरकार के

हर पल बहाने ढूंढ़ते रहते हो तुम तकरार के
ये क्या तरीके हैं बसाने को `सखा' घर बार के

~श्याम सखा 'श्याम'

नये साल में

ज़िन्दगी हो सुहानी नये साल में
दिल में हो शादमानी नये साल में

सब के आँगन में अबके महकने लगे
दिन को भी रात-रानी नये साल में

ले उड़े इस जहाँ से धुआँ और घुटन
इक हवा ज़ाफ़रानी नये साल में

इस जहाँ से मिटे हर निशाँ झूठ का
सच की हो पासबानी नये साल में

है दुआ अबके ख़ुद को न दोहरा सके
नफ़रतों की कहानी नये साल में

बह न पाए फिर इन्सानियत का लहू
हो यही मेहरबानी नये साल में

राजधानी में जितने हैं चिकने घड़े
काश हों पानी-पानी नये साल में

वक़्त! ठहरे हुए आँसुओं को भी तू
बख़्शना कुछ रवानी नये साल में

ख़ुशनुमा मरहलों से गुज़रती रहे
दोस्तों की कहानी नये साल में

हैं मुहब्बत के नग़्मे जो हारे हुए
दे उन्हें कामरानी नये साल में

अब के हर एक भूखे को रोटी मिले
और प्यासे को पानी नये साल में

काश खाने लगे ख़ौफ़ इन्सान से
ख़ौफ़ की हुक्मरानी नये साल में

देख तू भी कभी इस ज़मीं की तरफ़
ऐ नज़र आसमानी ! नये साल में

कोशिशें कर, दुआ कर कि ज़िन्दा रहे
द्विज ! तेरी हक़-बयानी नये साल में.
~द्विजेन्द्र द्विज

शादमानी- प्रसन्नता ; जाफ़रानी- केसर जैसी सुगन्ध जैसी ; पासबानी-सुरक्षा ; हुक्मरानी-सत्ता,शासन ;
हक़-बयानी- सच कहने की आदत; कामरानी- सफलता; मरहले- पड़ाव


नया साल कविता

पहली जनवरी: ऑक्टावियो पाज़
द्वार खुल पड़ते हैं वर्ष के
जैसे कि भाषा के, 
अज्ञात मार्गों मे:
कहा तुमने गत रात्रि:

कल
सोचने पड़ेंगे हमें दिशा-चिह्न, 
बनाना होगा एक दृश्यालेख
पन्नों पर दिन और कागज के
निर्मित करनी होंगी योजना।
कल, खोजना पड़ेगा हमें
फिर से
यथार्थ संसार का।

खोली आँखें देर से मैने
एक लघु मुहूर्त को
 अनुभव किया मैने
जो अजतेक* करते थे
जल से निकली मुख्यभूमि 
पर लेटे,
करते प्रतीक्षा-
निकले न निकले
सूर्य - समय का,
क्षितिज की दरारों से।

किंतु, नही, आया है लौट वर्ष।
भर दिये हैं इसने सारे कमरे,
नजर ने इसे मेरी छू लिया लगभग।
समय ने, बिना किसी मदद के हमारी,
कल जैसे, रख दिये फिर से,
घर खाली सड़कों पर,
रख दी घरों पर बर्फ,
चुप्पी उस बर्फ पर।

थीं तुम बगल मे मेरी,
अब तक सोयी पड़ी,
दिन ने तुम्हे लिया ढूँढ़
अब तक अनजान
पर इससे तुम,
कर लिया आविष्कृत
दिन ने तुमको।
-न ही यह ज्ञात तुम्हे मै भी
पकड़ मे हूँ दिन की।
थीं तुम किसी अन्य ही दिन मे।

थीं तुम बगल मे मेरी,
बर्फ की तरह, लिया देख
मैने तुम्हे
सोयी पड़ी बीच आभासों के।
समय बिना मदद के हमारी,
है खोजता घर, पेड़, गलियाँ
स्त्रियाँ सोयी हुई।

खोलोगी जब अपनी आँखें तुम,
टहलेंगे फिर से हम एक बार
प्रहरों के बीच और उनकी
प्राप्तियों में,
बीच आभासों के डोलते,
देंगे गवाही हम समय की.
उसकी क्रियाओं की।
खोलेंगे दरवाजे दिन के हम,
करेंगे प्रवेश 
अज्ञात मे।

(अज़तेक: एक मेक्सिकोवासी जातीय समुदाय जिनका अस्तित्व सोलहवीं शताब्दी का था। वे सूर्य के आराधक थे।)