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Wednesday, 28 December 2011

नया साल कविता

पहली जनवरी: ऑक्टावियो पाज़
द्वार खुल पड़ते हैं वर्ष के
जैसे कि भाषा के, 
अज्ञात मार्गों मे:
कहा तुमने गत रात्रि:

कल
सोचने पड़ेंगे हमें दिशा-चिह्न, 
बनाना होगा एक दृश्यालेख
पन्नों पर दिन और कागज के
निर्मित करनी होंगी योजना।
कल, खोजना पड़ेगा हमें
फिर से
यथार्थ संसार का।

खोली आँखें देर से मैने
एक लघु मुहूर्त को
 अनुभव किया मैने
जो अजतेक* करते थे
जल से निकली मुख्यभूमि 
पर लेटे,
करते प्रतीक्षा-
निकले न निकले
सूर्य - समय का,
क्षितिज की दरारों से।

किंतु, नही, आया है लौट वर्ष।
भर दिये हैं इसने सारे कमरे,
नजर ने इसे मेरी छू लिया लगभग।
समय ने, बिना किसी मदद के हमारी,
कल जैसे, रख दिये फिर से,
घर खाली सड़कों पर,
रख दी घरों पर बर्फ,
चुप्पी उस बर्फ पर।

थीं तुम बगल मे मेरी,
अब तक सोयी पड़ी,
दिन ने तुम्हे लिया ढूँढ़
अब तक अनजान
पर इससे तुम,
कर लिया आविष्कृत
दिन ने तुमको।
-न ही यह ज्ञात तुम्हे मै भी
पकड़ मे हूँ दिन की।
थीं तुम किसी अन्य ही दिन मे।

थीं तुम बगल मे मेरी,
बर्फ की तरह, लिया देख
मैने तुम्हे
सोयी पड़ी बीच आभासों के।
समय बिना मदद के हमारी,
है खोजता घर, पेड़, गलियाँ
स्त्रियाँ सोयी हुई।

खोलोगी जब अपनी आँखें तुम,
टहलेंगे फिर से हम एक बार
प्रहरों के बीच और उनकी
प्राप्तियों में,
बीच आभासों के डोलते,
देंगे गवाही हम समय की.
उसकी क्रियाओं की।
खोलेंगे दरवाजे दिन के हम,
करेंगे प्रवेश 
अज्ञात मे।

(अज़तेक: एक मेक्सिकोवासी जातीय समुदाय जिनका अस्तित्व सोलहवीं शताब्दी का था। वे सूर्य के आराधक थे।)