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Friday, 29 July 2011

ज़रीना सानी


मेरी हस्ती
मेरी हस्ती की हकीकत क्या है
एक शोला है हवा की ज़द पर
जो भड़कता भी है
जो सर्द भी हो जाता है
या सफीना है कोई
वक्त की लहरों पे रवाँ
आज तक हस्ती ए मौहूम का इर्फां न हुआ
खुदशनासी व खुदआगाही क्या
नफ्स ए नाकारा तकाज़े तेरे
खुदफरेबी के सिवा कुछ भी नही
कौन समझायेगा हस्ती की हक़ीक़त मुझको
है कोई?
कोई भी है?
~ज़रीना सानी

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मेरी सुबह हो के न हो मुझे है फिराक़ यार से वास्ता
शबे ग़म से मेरा मुकाबला दिले बेकरार से वास्ता

मेरी जिन्दगी न संवर सकी मेरे ख्वाब सारे बिखर गये
मैं खिजाँ रसीदा कली हूँ अब मुझे क्या बहार से वास्ता

जो था हाल ज़ार वो बिखर चुकी मगर अब खुशी है ये आपकी
कि जवाबे खत मुझे दें न दें, मुझे इंतिज़ार से वास्ता

मेरे इश्क में ये नहीं रवा कि खुलूस प्यार का लूँ सिला
कहूं क्यूँ मैं आपको बेवफा मुझे अपने प्यार से वास्ता

बड़ी बेखुदी में निकल पड़ी ए “ज़रीना” खैर हो राह की
जहां काफिले लुटे रोज़ो-शब उसी रहगुज़र से वास्ता
~ज़रीना सानी