Friday, 6 January 2012

"कारवां यादों का लौटा दिन
गुज़र जाने के बाद
फिर चला जायेगा शायद
कुछ वक़्त ठहर जाने के बाद
तिश्नगी के वास्ते था बूँद
भर पानी बहुत
क्या करे हम ले के जाम
प्यास मर जाने के बाद
कल
भारी आबादियाँ थी आज
तूफ़ान ले गया
छायी है
वीरानियाँ दरिया उतर
जाने के बाद
प्यार जब तक है दिलों में
रिश्तों में भी जान है
दुश्मनी का फिर है आलम
प्यार मर जाने के बाद
राह की दुश्वारियां हर
हाल में झेले हम
कुछ तो राहत चाहे इंसान
अपने घर जाने के बाद
मोतियों के ढेर जैसे थे वोह
गुज़रे दिन सुहाने
उनकी यादों के समेटे
वो बिखर जाने के बाद
कौन है
अपना पराया कौन है
बता
जानेंगे बस मुश्किलों में
उनके मुकर जाने के बाद"

1 comment:

  1. यही तो सच है आज का!
    चलते रहिये.

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