Friday, 6 January 2012

हम जैसे लोग तो कश्ती चला के देखते है
वो ओर होंगे जो तेवर हवा के देखते है

हमे यकीं है वो इक दिन जरूर आयेगा
इसी खयाल से घर को सजा के देखते है

वो हमसे दूर बहुत दूर है मगर फिर भी
उसे ख्यालो में अक्सर बुला के देखते है

ये मशवरा है के यूं राह मे फिरा न करो
तुम्हे खबर है के बन्दे खुदा के देखते है

ये खौफ है कि बता दें न दिल के राज कहीं
उसे हम आज भी नजरें बचा के देखते है

सवाल ये नही, बनता है या नही बनता
बस उसका नक्श हवा मे बना के देखते है

कभी तो कोशिशें खुशबू को कैद करने की
कभी चिराग हवा में जला के देखते है
~अतीक इलाहाबादी
======================
अपना गम दिल के पास रहने दो,
मुझको यूँ ही उदास रहने दो.
नंग-ए-तहजीब न बन इतना,
कुछ तो तन पर लिबास रहने दो.
गम का सूरज भी डूब जाएगा,
दिल में इतनी सी आस रहने दो.
दौलते-ए-रंज-ओ-गम न छीन ए दोस्त,
कुछ गरीबों के पास रहने दे,
ए इमारत के तोड़ने वाले,
सिर्फ मेरा क्लास रहने दे.
करदे सारी खुशी आता उनको,
और गम मेरे पास रहने दे.
फिर तो दूरी नसीब में होगी,
और कुछ देर पास रहने दे.
~अतीक इलाहाबादी 
=============================
जब हवा अपना रुख बदलती है.
गर्द भी साथ साथ चलती है.
दिन का सूरज उफक में डूब गया,
अब सितारों से लौ निकलती है.
याद कर-कर के अहद-ए-माजी को,
जिंदगी अपने हाथ मलती है.
झील में तैरते हैं कुछ कागज़,
देखें कब तक नाव चलती है.
गुफ़्तगू उनकी चुभ गई दिल में,
देखें ये फांस कब निकलती है.
जी रहा हूँ मैं इस तरह से अतीक,
जैसे किस्तों में रात ढलती है.
~अतीक इलाहाबादी 
==========================
जिंदगी हादसों से गुजर आयी है.
मेरे खेतों में बदली उतर आयी है.
मेरी आँखे अचानक ही पथरा गयीं,
जब कहीं भी मुझे तू नज़र आयी है.
ज़ुल्फ़ बिखराए आँखों में सावन लिए,
इक सुहागन पिया के नगर आयी है.
भीनी-भीनी सी खुशबू है माहौल में,
तुमसे पहले तुम्हारी खबर आयी है.
मेरे घर में दहकते अलाव गिरे,
उनके आँगन में जन्नत उतर आयी है.
खत किताबों में रखके बदलते रहे,
आज शामत किताबों के सर आयी है.
ऐसा लगता है कि हर फूल पर,
उनके होंठों की सुर्खी उतर आयी है.
ऐ अतीक अब चरागों को गुल कीजिये,
आज याद उनकी फिर टूटकर आयी है.
~अतीक इलाहाबादी 
==============================

यारों ने साथ छोड के रस्ते बदल  लिए
जब पास अपने एक भी पैसा नहीं रहा
~अतीक इलाहाबादी 

No comments:

Post a Comment