Friday, 6 January 2012

कैफ़ी आजमी


तुम
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शगुफ्तगी का, लताफत का, शाहकार हो तुम,
फ़क़त बहार नहीं हासिले-बहार हो तुम,

जो इक फूल में है कैद, वो गुलिसतां हो,
जो इक कली में है पिन्हाँ वो लालाज़ार हो तुम

हलावतों की तमन्ना,मलाहतों की मुराद,
गुरूर कलियों का, फूलों का इनकिसार हो तुम

जिसे तरंग में फितरत ने गुनगुनाया है,
वो भैरवी हो , वो दीपक हो,वो मल्हार हो तुम

तुम्हारे जिस्म में ख्वाबीदा हैं हजारों राग,
निगाह छेड़ती है जिसको वोह सितार हो तुम

जिसे उठा न सकी जुस्तजू वो मोती हो,
जिसे न गुंध सकी आरज़ू, वो हार हो तुम

जिसे न बूझ सका इश्क़ वो पहेली हो,
जिसे समझ न सका प्यार वो प्यार हो तुम

खुदा करे किसी दामन में जज़्ब हो न सके
ये मेरे अश्के-हंसी जिनसे आशकार हो तुम.

~कैफ़ी आजमी

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