Wednesday, 28 December 2011

नया साल
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एक और वर्ष बीत रहा
बीत रहे लम्हों संग
हम भी तो बीत रहे
उम्र की जो पूँजी थी
वह भी तो रीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

जश्न हम मनाएं क्या
गीत नया गायें क्या
संचित अभिलाषा की
कथा अब सुनाएँ क्या
हौसलों की बुलंदी का
संगी भयभीत खड़ा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

स्मृति की अट्टालिका मे
पल छिन जो ठहरे हैं
अगणित रंगों मे घुले
रंग बड़े गहरे हैं
उसमें गम-सुम से मेरे
सपने सुनहरे हैं
पाँव मेरे ठिठके पर
समय प्रवाह जीत रहा.
यह वर्ष भी बीत रहा.

पर पास खड़ा नया साल
मुझको समझाता है
मद्धिम सी छेड़ तान
मुझको बहलाता है
प्राणों मे फिर से वही
आस फिर जगाता है
बीता जो लम्हा वह
बीत गया बात गई
आगे का हर पल तो
तेरा बस तेरा है
जाने दे उस पल को
जो बीत रहा बीत रहा

~रंजना सिंह

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